एक्सक्लूसिव: अपनी अथक मेहनत, लगन और सरकारी सहयोग से डेयरी क्षेत्र में नई पहचान बना रहे सोनल कांडवेय

Last Updated on May 31, 2026 by Gopi Krishna Verma सक्सेस स्टोरी/सफलता की कहानी एक नज़र: गिरिडीह। जिले के महेशलुंडी गांव के निवासी सोनल कांडवेय आज उन प्रगतिशील पशुपालकों में गिने जाते हैं, जिन्होंने सीमित संसाधनों के बावजूद अपनी मेहनत, दूरदर्शिता और आधुनिक तकनीकों के बल पर डेयरी व्यवसाय को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया है।…

Last Updated on May 31, 2026 by Gopi Krishna Verma

सक्सेस स्टोरी/सफलता की कहानी

एक नज़र:

  • 8 गायों से शुरू हुआ सफर, आज 50 दुधारू पशुओं की आधुनिक डेयरी का सपना हुआ साकार।
  • झारखंड सरकार की कामधेनु योजना योजना बनी संबल, सोनल कांडवेय ने डेयरी व्यवसाय को दी नई उड़ान।
  • साइलेज, ब्रीडिंग और जैविक खेती के सहारे आत्मनिर्भरता की मिसाल बने सोनल कांडवेय।
  • गव्य विकास विभाग द्वारा संचालित कामधेनु डेयरी फार्मिंग योजना से बदली तस्वीर, ग्रामीण उद्यमिता का मॉडल बने महेशलुंडी के युवा।

गिरिडीह। जिले के महेशलुंडी गांव के निवासी सोनल कांडवेय आज उन प्रगतिशील पशुपालकों में गिने जाते हैं, जिन्होंने सीमित संसाधनों के बावजूद अपनी मेहनत, दूरदर्शिता और आधुनिक तकनीकों के बल पर डेयरी व्यवसाय को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया है। उनकी सफलता न केवल अन्य पशुपालकों के लिए प्रेरणा है, बल्कि यह इस बात का भी प्रमाण है कि यदि सरकारी योजनाओं का सही उपयोग किया जाए तो ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार और आत्मनिर्भरता के नए अवसर पैदा किए जा सकते हैं।

वर्ष 2010 में श्री कांडवेय ने महज 8 पशुओं के साथ एक छोटे डेयरी फार्म की शुरुआत की थी। शुरुआत में कई चुनौतियां थीं, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने पशुओं के बेहतर पोषण, स्वास्थ्य प्रबंधन और वैज्ञानिक ब्रीडिंग को अपनी प्राथमिकता बनाया। समय के साथ उन्होंने अपने डेयरी फार्म का विस्तार किया और इसे एक संगठित डेयरी इकाई के रूप में विकसित किया।

श्री कांडवेय की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे पशुओं के लिए पौष्टिक हरे चारे की व्यवस्था स्वयं करते हैं। लगभग 10 एकड़ भूमि पर वे मौसम के अनुसार बाजरा, मक्का और बरसीम की खेती करते हैं। गर्मी के मौसम में बाजरा तथा सर्दियों में बरसीम का उत्पादन कर पशुओं को संतुलित आहार उपलब्ध कराया जाता है। इसके साथ ही वे मक्का से साइलेज तैयार करते हैं, जिससे पूरे वर्ष हरे चारे की उपलब्धता बनी रहती है। उनके फार्म में प्रतिवर्ष लगभग 100 टन साइलेज का उत्पादन होता है, जिससे दूध उत्पादन और पशुओं के स्वास्थ्य में उल्लेखनीय सुधार देखने को मिला है।

जैविक खेती को बढ़ावा देने के उद्देश्य से वे अपने डेयरी फार्म से प्राप्त गोबर का उपयोग खेतों में प्राकृतिक खाद के रूप में करते हैं। अब उन्होंने वर्मी कम्पोस्ट यूनिट भी स्थापित की है, जिससे गोबर को मूल्यवान जैविक खाद में परिवर्तित कर अतिरिक्त आय का स्रोत तैयार किया जा रहा है। इससे खेती की लागत कम होने के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण को भी बढ़ावा मिल रहा है। सोनल कांडवेय की मेहनत को तब और मजबूती मिली जब वित्तीय वर्ष 2024-25 में उन्हें झारखंड सरकार की 50 दुधारू पशु आधारित कमधेनु डेयरी फार्मिंग योजना का लाभ मिला।

लगभग 39.75 लाख रुपये की परियोजना लागत वाली इस योजना के तहत उन्हें 50 पशुओं की डेयरी इकाई स्वीकृत हुई। प्रथम चरण में 25 दुधारू पशुओं की खरीद की जा चुकी है तथा शेष पशुओं की व्यवस्था की प्रक्रिया जारी है। वे बताते हैं कि डेयरी व्यवसाय में केवल दूध उत्पादन ही नहीं, बल्कि वैज्ञानिक ब्रीडिंग, चारा उत्पादन, साइलेज निर्माण और जैविक खाद निर्माण जैसे पहलुओं पर भी समान रूप से ध्यान देना आवश्यक है। यही कारण है कि उनका फार्म आज एक समग्र कृषि एवं पशुपालन मॉडल के रूप में विकसित हो रहा है।

सोनल कांडवेय की यह सफलता कहानी दर्शाती है कि दृढ़ इच्छाशक्ति, नवाचार और सरकारी योजनाओं के प्रभावी उपयोग से ग्रामीण युवा भी रोजगार सृजन कर आत्मनिर्भर बन सकते हैं। उनका डेयरी फार्म आज क्षेत्र के किसानों और पशुपालकों के लिए प्रेरणा का केंद्र बन चुका है तथा आधुनिक डेयरी प्रबंधन का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत कर रहा है।

झारखंड सरकार के गव्य विकास विभाग का मिला मजबूत सहयोग

सोनल कांडवेय अपनी सफलता का श्रेय अपनी मेहनत के साथ-साथ झारखंड सरकार एवं गव्य विकास विभाग द्वारा संचालित जनकल्याणकारी योजनाओं को भी देते हैं। उनका कहना है कि जिला गव्य विकास पदाधिकारी द्वारा समय-समय पर तकनीकी मार्गदर्शन, प्रशिक्षण एवं आवश्यक सहयोग प्रदान किया गया, जिससे उन्हें अपने डेयरी व्यवसाय को आधुनिक तरीके से विकसित करने में मदद मिली। वित्तीय वर्ष 2024-25 में कमधेनु डेयरी फार्मिंग योजना के तहत 50 दुधारू पशुओं की स्वीकृति उनके डेयरी व्यवसाय के विस्तार में मील का पत्थर साबित हुई। विभाग की सक्रिय पहल और निरंतर सहयोग ने न केवल उनकी आय बढ़ाने में मदद की, बल्कि उन्हें अन्य पशुपालकों के लिए एक प्रेरणास्रोत के रूप में स्थापित किया है।

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Pappu Kumar Verma

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