मानवीय संवेदना से परे नियमों की अंधी दौड़: जब कागज़ी उम्र के फेर में बेसहारा बच्चों का अधिकार छीनने लगा था तंत्र, रांची हाईकोर्ट बना सहारा

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Last Updated on September 1, 2026 by Gopi Krishna Verma

सीसीएल के कर्मचारी शिव शंकर राम व उनकी पत्नी की असमय मृत्यु के बाद उनके तीनों मासूम बच्चों से जुड़ा है मामला

कोर्ट की खबरें। न्यायपालिका को अक्सर कठोर कानूनों और दलीलों का मंच माना जाता है, लेकिन झारखंड हाईकोर्ट के एक हालिया फैसले ने यह साबित कर दिया है कि न्याय का असली मकसद कागजी लकीरों पर नहीं, बल्कि मानवीय आधार और सामाजिक सुरक्षा पर टिका होना चाहिए।

सेंट्रल कोलफील्ड्स लिमिटेड (CCL) के एक कर्मचारी शिव शंकर राम की असमय मृत्यु के बाद उनके तीनों मासूम बच्चे—अवंतिका, तनुस और अभिषेक—पूरी तरह अनाथ हो गए थे। पिता की नौकरी के आधार पर अनुकंपा (compassionate appointment) के तहत 15 वर्षीय तनुस का नाम ‘लाइव रोस्टर’ में दर्ज करने की मांग की गई थी, ताकि बालिग होने पर उसे रोजगार का अवसर मिल सके। हालांकि, कंपनी प्रशासन ने सामाजिक सुरक्षा की मंशा को समझने के बजाय मेडिकल बोर्ड की उम्र संबंधी जांच को एकमात्र आधार बनाकर दावों को खारिज कर दिया—जबकि तनुस के आधार कार्ड, स्कूल रिकॉर्ड और सर्विस बुक में एक ही जन्मतिथि (21 अक्टूबर 2008) दर्ज थी।

कोर्ट का मानवीय और न्यायसंगत दृष्टिकोण

जस्टिस दीपक रोशन की अदालत ने इस मामले पर सुनवाई करते हुए न केवल सीसीएल (CCL) के आदेश को रद्द किया, बल्कि संस्थागत और प्रशासनिक सोच पर भी सवाल खड़े किए:

  • तकनीकी जांच बनाम आधिकारिक दस्तावेज: अदालत ने स्पष्ट किया कि रेडियोलॉजिकल या मेडिकल बोर्ड की जांच अंतिम और पूर्णतः सटीक प्रमाण नहीं होती। यदि सभी सरकारी व शैक्षणिक दस्तावेजों में एक ही जन्मतिथि दर्ज है, तो केवल अनुमानित मेडिकल जांच के आधार पर हक छीनना अनुचित है।
  • सामाजिक सुरक्षा की भावना: कोर्ट ने टिप्पणी की कि अनुकंपा नियुक्ति सिर्फ रोजगार देने का मामला नहीं है, बल्कि यह एक ‘सामाजिक सुरक्षा योजना’ है। जब किसी परिवार का सहारा छिन जाता है, तो नियमों की व्याख्या तकनीकी रूप से कठोर होकर नहीं, बल्कि लाभार्थियों के हित में उदारतापूर्वक की जानी चाहिए।
  • भविष्य की सुरक्षा: हाईकोर्ट ने सीसीएल को निर्देश दिया है कि तनुस का नाम तुरंत लाइव रोस्टर में शामिल किया जाए ताकि बालिग होने पर वह नौकरी पाने का हकदार बने। साथ ही, उसकी बड़ी बहन अवंतिका कुमारी को नियमानुसार मौद्रिक मुआवजा देने का भी आदेश दिया गया है।

अदालत के फैसले ने तीन बच्चों को दिया ज़ीने का सहारा

यह मामला इस बात का बड़ा उदाहरण है कि जब सरकारी या अर्ध-सरकारी संस्थान नियमों को संवेदनशील नजरिए से देखने के बजाय सिर्फ खारिज करने का जरिया बना लेते हैं, तो अनाथ और असहाय नागरिकों के सामने कितना बड़ा संकट खड़ा हो जाता है। अदालत के इस फैसले ने न केवल तीन अनाथ बच्चों का भविष्य सुरक्षित किया है, बल्कि सार्वजनिक संस्थानों को यह याद दिलाया है कि नियम इंसान और समाज की भलाई के लिए बनाए जाते हैं, उनके अधिकार छीनने के लिए नहीं।

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