Last Updated on September 6, 2026 by Gopi Krishna Verma
जिसे गैस समझा, वही दर्द बन गया आखिरी सफर
सीने में दर्द उठा तो अस्पताल जाने से किया इनकार, दो घंटे बाद खुद बोले—”गाड़ी निकालो… अस्पताल जाना है

गिरिडीह। शनिवार की रात तक सब कुछ सामान्य था। घर में बातचीत थी, अपनों का साथ था और सुदिव्य कुमार सोनू हमेशा की तरह अपने लोगों के बीच थे। किसी ने नहीं सोचा था कि कुछ घंटों बाद गिरिडीह अपने जनप्रतिनिधि और झारखंड सरकार के कद्दावर मंत्री को हमेशा के लिए खो देगा। रविवार की सुबह करीब तीन-चार बजे मर्सी अस्पताल से निकली उनके निधन की खबर ने पूरे गिरिडीह को स्तब्ध कर दिया।
मंत्री के सुरक्षा प्रभारी विक्रम पासवान की जुबान से निकली उस रात की कहानी सुनकर हर किसी का कलेजा कांप उठता है। उन्होंने बताया कि शनिवार रात करीब 12 बजे सुदिव्य कुमार ने सीने में दर्द की शिकायत की। पत्नी ने उन्हें तुरंत डॉक्टर के पास चलने को कहा, लेकिन उन्होंने इसे गैस की समस्या समझकर अस्पताल जाने से इनकार कर दिया।
लेकिन रात बढ़ने के साथ दर्द भी बढ़ता गया। करीब दो बजे अचानक उनकी तबीयत ज्यादा बिगड़ गई। तब उन्होंने खुद कहा—“गाड़ी निकालो, अस्पताल जाना है।”

इसके बाद सब कुछ जैसे भागते हुए हुआ। गाड़ी निकाली गई और उन्हें अस्पताल ले जाया जाने लगा। रास्ते में उनकी तबीयत और बिगड़ी और उन्हें उल्टी होने लगी। परिजनों और सुरक्षाकर्मियों की बेचैनी बढ़ती गई। कुछ ही देर में उन्हें मर्सी अस्पताल पहुंचाया गया। चिकित्सकों ने तत्काल इलाज शुरू किया, लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद सुदिव्य कुमार को बचाया नहीं जा सका।
सबसे करीब था, फिर भी नहीं बचा सका साहब को
सुदिव्य कुमार के सुरक्षा प्रभारी विक्रम पासवान के लिए यह हादसा सिर्फ एक मंत्री को खोना नहीं, बल्कि अपने बेहद करीबी व्यक्ति को खोना है। वर्षों से साये की तरह उनके साथ रहने वाले पासवान की आंखों के सामने वह दृश्य बार-बार घूम रहा है।
नम आंखों और रुंधे गले से उन्होंने कहा कि वह मंत्री के सबसे करीब थे। हर वक्त उनके साथ रहते थे। लेकिन जिस वक्त उन्हें बचाने की सबसे ज्यादा जरूरत थी, उसी वक्त वह बेबस हो गए।
“साहब मेरे सामने थे… मैं उनके सबसे करीब था, लेकिन उन्हें बचा नहीं सका।”
इतना कहते-कहते पासवान की आवाज भर आती है। चेहरे पर गम और आंखों में पछतावा साफ दिखाई देता है। उन्हें इस बात का मलाल है कि वह अपने साहब को बचाने के लिए सब कुछ होते हुए भी कुछ नहीं कर सके।

एक रात, जिसने सब कुछ बदल दिया
सीने में उठे दर्द को शुरुआत में गैस समझना और अस्पताल जाने में हुई देरी अब परिवार, करीबियों और समर्थकों के लिए जीवनभर का दर्द बन गई है। मन में यही सवाल उठ रहा है कि अगर उस वक्त दर्द को गंभीरता से लिया गया होता और तत्काल अस्पताल पहुंचाया गया होता तो शायद कहानी कुछ और होती।

लेकिन अब सब कुछ पीछे छूट चुका है। गिरिडीह का एक मजबूत चेहरा, एक सक्रिय जनप्रतिनिधि और लोगों के बीच अपनी अलग पहचान रखने वाला नेता हमेशा के लिए खामोश हो चुका है।
रविवार की सुबह गिरिडीह में सिर्फ एक मंत्री की मौत की खबर नहीं पहुंची, बल्कि हजारों लोगों के लिए ऐसा सदमा लेकर आई, जिसे स्वीकार करना आसान नहीं है। जिन लोगों ने उन्हें करीब से देखा, उनके लिए अब सबसे कठिन यही है कि कल तक जो शख्स उनके बीच था, वह आज सिर्फ यादों में रह गया है।




