मुख्य सूचना आयुक्त की नियमित नियुक्ति और लंबित अपीलों की सुनवाई तत्काल शुरू करने की मांग

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Last Updated on September 4, 2026 by Gopi Krishna Verma

सिविल सोसाइटी गिरिडीह ने राज्यपाल को लिखा पत्र

गिरिडीह। झारखंड राज्य सूचना आयोग में मुख्य सूचना आयुक्त का पद रिक्त होने से आयोग की कार्यप्रणाली प्रभावित होने और हजारों द्वितीय अपीलों व शिकायतों के लंबित रहने पर सिविल सोसाइटी गिरिडीह ने गहरी चिंता जताई है। संस्था ने झारखंड के राज्यपाल को पत्र भेजकर इस स्थिति में तत्काल हस्तक्षेप करने और आवश्यक कदम उठाने का अनुरोध किया है।

सिविल सोसाइटी गिरिडीह के महासचिव शंकर पांडेय द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है कि सूचना आयुक्तों की मौजूदगी के बावजूद मुख्य नेतृत्व न होने के कारण आयोग में मामलों का समयबद्ध निस्तारण नहीं हो पा रहा है। इसका सीधा असर उन आम नागरिकों पर पड़ रहा है, जो पारदर्शी शासन और सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम, 2005 के तहत न्याय की उम्मीद में आयोग का दरवाजा खटखटाते हैं।

प्रेस विज्ञप्ति के मुख्य बिंदु

  • समय पर सुनवाई बिना RTI निष्प्रभावी: संस्था का कहना है कि जब भ्रष्टाचार, अनियमितता या प्रशासनिक लापरवाही से जुड़ी सूचनाओं पर समय पर सुनवाई नहीं होती, तो सूचना पाने का अधिकार व्यावहारिक रूप से समाप्त हो जाता है।
  • राजकोष पर वित्तीय भार: आयोग के आयुक्तों व कर्मचारियों के वेतन, कार्यालय और वाहनों पर हर महीने लाखों रुपये खर्च हो रहे हैं। इसके बावजूद कामकाज प्रभावित रहना जनता के पैसों के समुचित उपयोग पर सवाल खड़े करता है।
  • पूर्व की अंतरिम व्यवस्था का हवाला: पत्र में ध्यान दिलाया गया कि 27 दिसंबर 2019 को राज्य सरकार ने एक सूचना आयुक्त को कार्यवाहक मुख्य सूचना आयुक्त का प्रभार दिया था। वर्तमान परिस्थितियों में भी नियमित नियुक्ति होने तक ऐसी ही विधि-सम्मत अंतरिम व्यवस्था की जानी चाहिए।

राज्यपाल से की गई दो प्रमुख मांगें

  1. शीघ्र नियमित नियुक्ति: मुख्य सूचना आयुक्त की नियमित नियुक्ति की प्रक्रिया को समयबद्ध तरीके से जल्द से जल्द पूरा कराया जाए।
  2. लंबित मामलों का निस्तारण: वर्षों से अटकी द्वितीय अपीलों और शिकायतों की शीघ्र सुनवाई के लिए ठोस निर्देश व कार्ययोजना जारी की जाए।

सिविल सोसाइटी ने उम्मीद जताई है कि राज्यपाल इस जनहित के मुद्दे पर शीघ्र संज्ञान लेंगे ताकि लोकतांत्रिक जवाबदेही और नागरिकों के वैधानिक अधिकारों की रक्षा हो सके।

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