Last Updated on September 29, 2026 by Gopi Krishna Verma
ग्राहक ने कहा ‘NO’, फिर भी बार-बार कॉल क्यों? सामाजिक कार्यकर्ता सुनील खंडेलवाल ने नियामकीय हस्तक्षेप और कड़े नियमों की मांग की

गिरिडीह। बैंकिंग सेवाओं में ग्राहकों की निजता और उनकी स्वतंत्र इच्छा पर लगातार बढ़ रहे कमर्शियल दबाव का एक गंभीर मामला सामने आया है। बैंकों द्वारा क्रेडिट कार्ड बेचने के लिए ग्राहकों को उनकी सहमति के बिना बार-बार फोन, SMS, ईमेल और WhatsApp मैसेज भेजे जाने को लेकर वित्त मंत्रालय के सचिव से औपचारिक शिकायत दर्ज कराई गई है। यह शिकायत गिरिडीह के सामाजिक एवं सूचना अधिकार (RTI) कार्यकर्ता सुनील खंडेलवाल द्वारा दर्ज कराई गई है।
ग्राहकों की निजता और निर्णय के अधिकार पर हमला
सुनील खंडेलवाल ने अपनी शिकायत में निजी बैंकों की कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि बैंक ग्राहकों के खाते में जमा राशि, दैनिक लेन-देन और बैंकिंग संबंधों का डेटा इस्तेमाल करके उन पर क्रेडिट कार्ड लेने का लगातार दबाव बनाते हैं। सबसे चिंताजनक स्थिति तब उत्पन्न होती है जब ग्राहक द्वारा स्पष्ट रूप से मना (‘No’) कर दिए जाने के बावजूद बैंक और उनकी टेलीकॉलिंग एजेंसियां बार-बार संपर्क करती हैं। यह रवैया ग्राहकों के लिए सुविधा बनने के बजाय मानसिक परेशानी और तनाव का कारण बन रहा है।

शिकायत में की गई मुख्य मांगें:
- स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी हों: भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) और वित्त मंत्रालय सभी निजी बैंकों व क्रेडिट कार्ड जारीकर्ताओं के लिए सख्त गाइडलाइंस बनाएं कि एक बार असहमति जताने के बाद ग्राहक को दोबारा कमर्शियल कॉल या मैसेज न किए जाएं।
- ‘Do Not Contact’ का प्रभावी रिकॉर्ड: बैंक अपने सिस्टम में ग्राहकों की “Do Not Contact / No Promotional Communication” प्राथमिकताओं को अनिवार्य रूप से दर्ज करें।
- उल्लंघन पर जवाबदेही तय हो: यदि कोई बैंक ग्राहक की स्पष्ट मनाही के बाद भी प्रचार संदेश या कॉल भेजता है, तो उस पर सख्त नियामकीय कार्रवाई और जुर्माना लगाया जाए।
“बैंकिंग उत्पाद ग्राहक की आवश्यकता और स्वतंत्र इच्छा पर आधारित होने चाहिए। जब ग्राहक को क्रेडिट कार्ड की आवश्यकता होगी, वह स्वयं आवेदन कर देगा। ‘नहीं’ कहने के बाद भी बार-बार संपर्क करना ग्राहक की सुविधा नहीं, बल्कि उसके निर्णय के सम्मान का प्रश्न है।” — सुनील खंडेलवाल, सामाजिक व RTI कार्यकर्ता

आम बैंक ग्राहकों से जुड़ा व्यापक मुद्दा
खंडेलवाल का मानना है कि यह मामला केवल किसी एक व्यक्ति विशेष का नहीं है, बल्कि देश के उन करोड़ों बैंक ग्राहकों के अधिकारों, निजता और मानसिक शांति से जुड़ा है जो रोजाना इन अनचाही (Spam) प्रमोशनल कॉल्स से परेशान होते हैं। अब सभी की निगाहें वित्त विभाग और संबंधित नियामकीय प्राधिकरणों पर टिकी हैं कि वे ग्राहकों की असहमति का सम्मान कराने के लिए क्या ठोस और कड़े कदम उठाते हैं।




