Last Updated on September 7, 2026 by Gopi Krishna Verma

गिरिडीह। जिस बराकर नदी के तट और गिरिडीह की माटी के विकास के लिए सुदिव्य कुमार सोनू आजीवन संघर्ष करते रहे, सोमवार को उसी बराकर की कलकल बहती धारा में उनकी पवित्र अस्थियाँ हमेशा-हमेशा के लिए विलीन हो गईं। धार्मिक विधि-विधान के बीच जब उनके पुत्र श्रेयश ने भरे मन और कांपते हाथों से पिता की अस्थियों को नदी में प्रवाहित किया, तो वहां मौजूद हर शख्स का दिल बैठ गया।
यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान या पिता को पुत्र द्वारा दी गई अंतिम विदाई भर नहीं थी, बल्कि गिरिडीह के उस ‘मजबूत स्तम्भ’ का अंतिम प्रस्थान था, जिसकी राजनीतिक यात्रा और जनसेवा के किस्से अब इतिहास के पन्नों में दर्ज हो चुके हैं।

पुत्र श्रेयश का छलका दर्द, समर्थकों की थमीं सांसें
रविवार को जब उनके असमय निधन की खबर आई थी, तब पूरा गिरिडीह स्तब्ध रह गया था। अंतिम यात्रा में उमड़ा जनसैलाब इस बात का गवाह था कि सुदिव्य सोनू सिर्फ एक विधायक या मंत्री नहीं, बल्कि आम जनता के सुख-दुख के साथी थे। सोमवार को अस्थि विसर्जन के दौरान तट पर सन्नाटा पसरा था। पुत्र श्रेयश जैसे ही अपने पिता की अंतिम निशानियों को नदी की धार को सौंप रहे थे, उनकी आंखें छलक पड़ीं—और उनके साथ तट पर खड़ा हर समर्थक, शुभचिंतक व परिजन रो पड़ा।
एक अपूरणीय क्षति: जनसेवा की जो राह अधूरी रह गई
सदर विधायक के रूप में और झारखंड सरकार में मंत्री रहते हुए सुदिव्य कुमार सोनू ने गिरिडीह के बुनियादी विकास, शिक्षा, और आम नागरिकों की समस्याओं को हल करने में प्रमुख भूमिका निभाई थी। स्थानीय लोगों का कहना है कि उनकी कार्यशैली में एक अलग आत्मीयता थी; वे पद की गरिमा के साथ-साथ ज़मीन से जुड़े रहने के लिए जाने जाते थे।

अस्थि विसर्जन के साथ ही अंतिम संस्कार का यह धार्मिक पड़ाव भले ही पूरा हो गया हो, लेकिन गिरिडीह की राजनीति और जनसेवा में जो शून्य पैदा हुआ है, उसकी भरपाई आसान नहीं होगी। बराकर की लहरों में बहती अस्थियों के साथ गिरिडीह ने अपना एक सच्चा जननायक खो दिया, जिसकी कमी आने वाले लंबे समय तक महसूस की जाएगी।




