झारखंड राज्य सूचना आयोग के कामकाज पर सिविल सोसाइटी गिरिडीह ने उठाए गंभीर सवाल

Last Updated on September 2, 2026 by Gopi Krishna Verma जनता का पैसा, जनता की संस्था और जनता के प्रति जवाबदेही तय हो गिरिडीह। सिविल सोसाइटी गिरिडीह ने झारखंड राज्य सूचना आयोग के वर्तमान कामकाज, लंबित द्वितीय अपील एवं शिकायत वादों तथा सूचना आयुक्तों पर होने वाले सार्वजनिक व्यय को लेकर सरकार और राज्य सूचना…

Last Updated on September 2, 2026 by Gopi Krishna Verma

जनता का पैसा, जनता की संस्था और जनता के प्रति जवाबदेही तय हो

गिरिडीह। सिविल सोसाइटी गिरिडीह ने झारखंड राज्य सूचना आयोग के वर्तमान कामकाज, लंबित द्वितीय अपील एवं शिकायत वादों तथा सूचना आयुक्तों पर होने वाले सार्वजनिक व्यय को लेकर सरकार और राज्य सूचना आयोग से तथ्यात्मक, पारदर्शी और सार्वजनिक जवाब की मांग की है।

सिविल सोसाइटी का कहना है कि सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 केवल एक कानून नहीं, बल्कि लोकतंत्र में पारदर्शिता और जवाबदेही का नागरिक हथियार है। जब कोई नागरिक सरकारी विभाग से सूचना मांगता है और सूचना उपलब्ध नहीं कराई जाती, तो वह द्वितीय अपील अथवा शिकायतवाद के माध्यम से राज्य सूचना आयोग का दरवाजा खटखटाता है। ऐसे में आयोग की कार्यक्षमता और लंबित मामलों का समयबद्ध निपटारा सीधे-सीधे आम नागरिक के सूचना के अधिकार से जुड़ा हुआ विषय है।

चार सूचना आयुक्तों की नियुक्ति के बाद जनता जानना चाहती है वास्तविक स्थिति

उपलब्ध जानकारी के अनुसार 10 जून 2026 को झारखंड में चार सूचना आयुक्तों की नियुक्ति हुई तथा 01 जुलाई 2026 को चारों सूचना आयुक्तों को शपथ दिलाई गई।

सिविल सोसाइटी गिरिडीह स्पष्ट करना चाहती है कि वह किसी सूचना आयुक्त अथवा सरकार की नीयत पर व्यक्तिगत टिप्पणी या आरोप नहीं लगा रही है। हमारा सवाल पूरी तरह संस्थागत जवाबदेही और सार्वजनिक धन के उचित उपयोग से संबंधित है।

जब राज्य की एक संवैधानिक सार्वजनिक संस्था नागरिकों के सूचना संबंधी मामलों का निपटारा करने के लिए गठित है, तब जनता को यह जानने का पूरा अधिकार है कि उस संस्था का कामकाज वास्तविक रूप से किस गति से चल रहा है।

वेतन और सुविधाओं पर भी हो सार्वजनिक पारदर्शिता

उपलब्ध जानकारी के अनुसार एक सूचना आयुक्त को लगभग ₹2,25,000 बेसिक वेतन, ₹1,35,000 DA तथा ₹45,000 HRA, अर्थात लगभग ₹4,05,000 प्रतिमाह प्राप्त होने की जानकारी सामने आती है।

इसके अतिरिक्त नियमों के अंतर्गत देय अन्य सुविधाओं, जैसे चिकित्सा व्यय की प्रतिपूर्ति, चालक सहित सरकारी वाहन, आवास पर समाचार-पत्र, मोबाइल फोन अथवा संचार संबंधी सुविधाएं आदि पर भी सार्वजनिक धन खर्च हो सकता है। चार सूचना आयुक्तों के स्तर पर यह सार्वजनिक व्यय स्वाभाविक रूप से जनता के लिए जवाबदेही का विषय बन जाता है।

कहा हमारा सवाल यह नहीं है कि किसी अधिकारी को वेतन या वैधानिक सुविधा क्यों दी जा रही है।

सवाल यह है कि जनता के पैसे से चलने वाली संस्था जनता के सूचना के अधिकार की रक्षा के लिए कितनी प्रभावी ढंग से काम कर रही है ?

सिविल सोसाइटी के सीधे सवाल

सिविल सोसाइटी गिरिडीह सरकार एवं झारखंड राज्य सूचना आयोग से निम्नलिखित सवालों का आंकड़ों सहित सार्वजनिक उत्तर मांगती है:

  1. 01 जुलाई 2026 को शपथ ग्रहण के बाद से चारों नवनियुक्त सूचना आयुक्तों के समक्ष कुल कितने मामलों की सुनवाई हुई ?
  2. इनमें कितने द्वितीय अपील वाद तथा कितने शिकायत वाद थे ?
  3. अब तक कुल कितने मामलों का अंतिम रूप से निष्पादन किया गया ?
  4. वर्तमान तारीख तक राज्य सूचना आयोग में कुल कितने द्वितीय अपील एवं शिकायत वाद लंबित हैं ?
  5. लंबित मामलों में कितने मामले कितने समय से लंबित हैं ? अर्थात 6 माह, 1 वर्ष, 2 वर्ष अथवा उससे अधिक पुराने मामलों की संख्या कितनी है ?
  6. यदि मामलों की सुनवाई अथवा निष्पादन अपेक्षित गति से नहीं हो रहा है, तो इसके प्रशासनिक, तकनीकी अथवा अन्य कारण क्या हैं ?
  7. क्या आयोग के पास लंबित मामलों के शीघ्र निपटारे के लिए कोई समयबद्ध कार्ययोजना है ? यदि है तो उसे सार्वजनिक किया जाए।
  8. चारों सूचना आयुक्तों के वेतन, भत्ते, वाहन, आवास, चिकित्सा, संचार एवं अन्य सुविधाओं पर 01 जुलाई 2026 से अब तक कुल कितना सार्वजनिक धन खर्च हुआ है ?
  9. आयोग के पास वर्तमान में उपलब्ध मानव संसाधन, कार्यालयीन व्यवस्था और प्रशासनिक सुविधाएं मामलों के त्वरित निपटारे के लिए पर्याप्त हैं या नहीं ?

जनता को केवल नियुक्ति नहीं, परिणाम भी चाहिए

सिविल सोसाइटी गिरिडीह का मानना है कि किसी सार्वजनिक संस्था की सफलता केवल इस बात से तय नहीं होती कि उसमें कितने पद भरे गए हैं, बल्कि इससे तय होती है कि नागरिकों की समस्याओं का समाधान कितनी तेजी और प्रभावशीलता से हुआ।

एक आम नागरिक जब RTI के माध्यम से किसी सरकारी कार्यालय से सूचना मांगता है और उसे सूचना नहीं मिलती, तो वह आयोग में अपील करता है। उसके लिए वह अपील केवल एक फाइल या नंबर नहीं होती, वह उसके कानूनी अधिकार, न्याय और जवाबदेही की उम्मीद होती है।

यदि ऐसी अपीलें वर्षों तक लंबित रहती हैं, तो सूचना का अधिकार कागज पर तो मौजूद रहता है, लेकिन उसका वास्तविक लाभ नागरिक तक नहीं पहुंच पाता।

इसलिए अब समय आ गया है कि झारखंड राज्य सूचना आयोग अपने कामकाज का रिपोर्ट कार्ड जनता के सामने रखे।

हमारी मांग स्पष्ट है, आंकड़े सार्वजनिक किए जाएं

सिविल सोसाइटी गिरिडीह मांग करती है कि झारखंड सरकार एवं राज्य सूचना आयोग अपनी आधिकारिक वेबसाइट अथवा सार्वजनिक माध्यम से नियमित रूप से निम्न जानकारी उपलब्ध कराएं:

१) कुल लंबित द्वितीय अपील वादों की संख्या

२) कुल लंबित शिकायत वादों की संख्या

३) नवनियुक्त सूचना आयुक्तों के समक्ष हुई सुनवाई की संख्या

४) निष्पादित मामलों की संख्या

५) लंबित मामलों की अवधि के अनुसार आंकड़े

६) प्रतिमाह सुनवाई एवं निष्पादन का विवरण

७) मामलों के लंबित रहने के प्रमुख कारण

८) लंबित मामलों के निपटारे की समयबद्ध कार्ययोजना

९) सूचना आयुक्तों के वेतन, भत्ते एवं अन्य सुविधाओं पर हुए सार्वजनिक व्यय का विवरण

१०) यह किसी व्यक्ति के खिलाफ अभियान नहीं है

सिविल सोसाइटी गिरिडीह पुनः स्पष्ट करती है कि यह किसी सूचना आयुक्त, अधिकारी अथवा सरकार के विरुद्ध व्यक्तिगत आरोप नहीं है।

यह सवाल व्यक्ति का नहीं, व्यवस्था का है।
यह सवाल नीयत का नहीं, परिणाम का है।
यह सवाल विरोध का नहीं, जवाबदेही का है।

जब सार्वजनिक धन खर्च होता है, तो जनता को यह जानने का अधिकार है कि उसके बदले सार्वजनिक संस्था कितना प्रभावी काम कर रही है।

जब नागरिक सूचना का अधिकार इस्तेमाल करता है, तो उसे समय पर सूचना और प्रभावी अपील व्यवस्था मिलना चाहिए।

और जब किसी संस्था को जनता के अधिकारों की रक्षा की जिम्मेदारी दी जाती है, तो उस संस्था का कामकाज भी जनता के सामने पारदर्शी होना चाहिए।

सिविल सोसाइटी गिरिडीह की सरकार एवं राज्य सूचना आयोग से अपील

हम आग्रह करते हैं कि इन सवालों को राजनीतिक विवाद या व्यक्तिगत आलोचना के रूप में न देखा जाए। इन्हें लोकतांत्रिक जवाबदेही के एक नागरिक प्रश्न के रूप में लिया जाए और तथ्य एवं आंकड़ों के साथ सार्वजनिक उत्तर दिया जाए।

क्योंकि:

“जनता का पैसा → जनता की संस्था → जनता के अधिकार → और जनता के प्रति जवाबदेही।”

सूचना का अधिकार तभी सार्थक है, जब सूचना के लिए नागरिक को वर्षों तक इंतजार न करना पड़े।

सिविल सोसाइटी गिरिडीह सरकार एवं राज्य सूचना आयोग से अपेक्षा करती है कि वह पारदर्शी आंकड़े सार्वजनिक कर जनता के विश्वास को मजबूत करे तथा लंबित मामलों के शीघ्र निपटारे के लिए ठोस और समयबद्ध कदम उठाए।

जवाब मांगना विरोध नहीं है।
जवाबदेही मांगना लोकतंत्र है।
और जनता के पैसे का हिसाब मांगना जनता का अधिकार है।

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Pappu Kumar Verma

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Gopi Krishna verma

Gopikrishna Verma serves as the Editor of the ‘Dahad India’ news portal. Furthermore, he possesses over fifteen years of experience in the field of journalism. In addition to his work with this news portal, he currently serves as a correspondent for the Hindi edition of the ‘Hindustan Times’. He began his career in journalism with the Hindi edition of the ‘Hindustan Times’. His writing on serious subjects—such as public issues, law, education, and the environment—is remarkable, unique, and inspiring. His dedication to the field of education is such that he himself serves as the Director and Science Mentor at an educational institution, the ‘Adarsh Institute of Education’.

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