Last Updated on October 12, 2026 by Gopi Krishna Verma

गिरिडीह। गिरिडीह कॉलेज के प्रख्यात दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर और शिक्षा जगत के जाने-माने स्तंभ मदन मोहन प्रसाद का 11 अक्टूबर को आकस्मिक निधन हो गया। वे लगभग 90 वर्ष के थे। उनके निधन से पूरे जिले में शोक की लहर दौड़ गई है।
जीवन और शिक्षा के प्रति समर्पण
श्री प्रसाद ने अपना संपूर्ण जीवन शिक्षा और ज्ञान के प्रसार में समर्पित कर दिया था। वे वर्ष 1996 में गिरिडीह कॉलेज के दर्शनशास्त्र विभाग से सेवानिवृत्त हुए थे। हालांकि, सेवानिवृत्ति के बाद भी वे निरंतर अध्ययन-अध्यापन और छात्रों के मार्गदर्शन से जुड़े रहे। दर्शनशास्त्र जैसे गंभीर विषय को वे अपनी सरल और रोचक शिक्षण शैली से विद्यार्थियों के लिए सहज बना देते थे।

स्वास्थ्य में गिरावट और अंतिम समय
परिजनों के अनुसार, 7 अक्टूबर को प्रातः भ्रमण से लौटने के बाद अचानक उनकी तबीयत बिगड़ गई थी। परिजनों द्वारा उसी दिन शाम को उन्हें आईसीयू में भर्ती कराया गया, जहाँ चिकित्सकों के तमाम प्रयासों के बावजूद उनके स्वास्थ्य में सुधार नहीं हो सका और उन्होंने अंततः अपनी अंतिम सांस ली।
बहुमुखी प्रतिभा के धनी और आध्यात्मिक व्यक्तित्व
श्री प्रसाद केवल एक विद्वान प्राध्यापक ही नहीं थे, बल्कि एक अत्यंत सहृदय, आध्यात्मिक और विनोदप्रिय इंसान थे।
- संगीत और अध्यात्म: दर्शनशास्त्र के साथ-साथ संगीत में उनकी गहरी रुचि थी। वे लंबे समय तक गायत्री परिवार से सक्रिय रूप से जुड़े रहे और आध्यात्मिक चेतना का प्रसार किया।
- योग और फिटनेस: वे योग शास्त्र के गहरे जानकार थे और फिटनेस के प्रति अत्यधिक समर्पित रहे। वे हमेशा लोगों को एक अच्छी दिनचर्या और स्वस्थ जीवनशैली अपनाने के लिए प्रेरित करते थे।
- सकारात्मक स्वभाव: उनका हंसमुख स्वभाव और जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण उन्हें हर वर्ग के लोगों के बीच बेहद लोकप्रिय बनाता था।

शोक की लहर
उनके निधन से उनके परिवार, हजारों छात्रों, शुभचिंतकों और पूरे गिरिडीह बौद्धिक जगत में गहरा शोक व्याप्त है। उनके जाने से एक ऐसे युग का अंत हुआ है जो ज्ञान, सादगी और अनुशासन का प्रतीक था।




