Last Updated on September 3, 2026 by Gopi Krishna Verma
आबद्ध निधि के समुचित उपयोग से सुदृढ़ होगी ग्रामीण पेयजल व्यवस्था, उपायुक्त ने योजनाओं के चयन एवं क्रियान्वयन में मानकों के अनुपालन के दिए निर्देश

गिरिडीह। उपायुक्त-सह-जिला दंडाधिकारी रामनिवास यादव की अध्यक्षता में आज समाहरणालय सभागार में 16वें वित्त आयोग की आबद्ध निधि (Tied Grant) के अंतर्गत पेयजल एवं स्वच्छता से संबंधित योजनाओं के चयन, प्राथमिकता निर्धारण, अनुमोदन एवं क्रियान्वयन को लेकर कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यशाला में जिला परिषद के सदस्य, पंचायत समिति सदस्य, मुखिया, पंचायत सचिव सहित संबंधित पदाधिकारी एवं कर्मी उपस्थित थे।
कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य ग्राम पंचायत विकास योजना (GPDP) के दौरान 16वें वित्त आयोग की आबद्ध निधि से पेयजल एवं स्वच्छता से संबंधित योजनाओं का नियमानुसार चयन कर उन्हें वार्षिक कार्ययोजना में सम्मिलित करना तथा e-Gramswaraj पोर्टल पर आवश्यक प्रविष्टि सुनिश्चित करना रहा। कार्यशाला में स्पष्ट किया गया कि वित्त आयोग की Tied Grant का उपयोग मुख्य रूप से पेयजल एवं स्वच्छता से संबंधित अनुमन्य गतिविधियों के क्रियान्वयन के लिए किया जाना है। पंचायतों द्वारा योजनाओं के चयन में उपलब्ध Master Activity List एवं निर्धारित वित्तीय प्रावधानों का अनुपालन सुनिश्चित किया जाना आवश्यक है।

पेयजल योजनाओं के संचालन एवं रख-रखाव पर विशेष जोर
कार्यशाला में बताया गया कि आबद्ध निधि के तहत पेयजल क्षेत्र में जलापूर्ति योजनाओं के संचालन एवं रख-रखाव (Operation & Maintenance) को प्राथमिकता दी जा सकती है। इसके लिए वार्षिक आवंटन की निर्धारित सीमा के अनुसार योजनाओं का चयन किया जाना है। प्रमुख प्राथमिकताओं में—
जलापूर्ति योजना/व्यवस्था का संचालन एवं रख-रखाव — 40 से 50 प्रतिशत तक।
जल स्रोत की स्थिरता एवं जल सुरक्षा — 15 से 25 प्रतिशत तक।
जल गुणवत्ता प्रबंधन — 20 प्रतिशत।
सेवा प्रदान करने में सुधार — 10 से 20 प्रतिशत तक।
मानव संसाधन सहयोग — 15 प्रतिशत तक।
IEC एवं सामुदायिक जन-जागरूकता — 5 प्रतिशत तक।
प्रशासनिक सहयोग — 3 प्रतिशत तक
का प्रावधान बताया गया।
स्थानीय जरूरत के अनुरूप अनुमन्य गतिविधियों का चयन
कार्यशाला में बताया गया कि ग्राम स्तर पर पेयजल व्यवस्था को सुचारु एवं टिकाऊ बनाए रखने के लिए अनुमन्य गतिविधियों का चयन स्थानीय आवश्यकता एवं प्राथमिकता के आधार पर किया जा सकता है। इनमें ओवरहेड टैंक की सफाई एवं मरम्मत, पंप-मोटर, वाल्व एवं कंट्रोल पैनल की छोटी-मोटी मरम्मत, पाइपलाइन का विस्तार, जलापूर्ति व्यवस्था से जुड़े ऑपरेटर/जल मित्र आदि से संबंधित अनुमन्य व्यय, क्लोरीनेशन डोजर की व्यवस्था, जल गुणवत्ता जांच हेतु किट/रिएजेंट की उपलब्धता तथा जलापूर्ति योजनाओं में सौर पैनल लगाने जैसी गतिविधियां शामिल हैं। इसके अतिरिक्त जल स्रोतों की सुरक्षा एवं स्थायित्व, वर्षा जल संचयन, जलाशयों/वॉटर बॉडीज का विकास, खराब बोरवेल/कुओं को रिचार्ज करने की व्यवस्था, हैंडपंपों का री-बोर एवं रख-रखाव तथा आपदा अथवा आकस्मिक स्थिति में क्षतिग्रस्त ग्रामीण पाइप जलापूर्ति अवसंरचना की मरम्मत एवं उन्नयन जैसी गतिविधियों को भी अनुमन्य प्रावधानों के अनुरूप शामिल किया जा सकता है।

जन-जागरूकता एवं सार्वजनिक स्थलों पर पेयजल सुविधा को प्राथमिकता
कार्यशाला में पेयजल संरक्षण एवं स्वच्छता के प्रति सामुदायिक सहभागिता बढ़ाने पर भी जोर दिया गया। इसके तहत जल बजटिंग, जल चौपाल, जल सेवा आकलन रिपोर्ट, जल बचाने के उपायों के प्रति जागरूकता, IEC गतिविधियां एवं जल अर्पण दिवस जैसी गतिविधियों को प्रोत्साहित करने की जानकारी दी गई। साथ ही विद्यालयों, आंगनबाड़ी केंद्रों, आश्रमशालाओं, हेल्थ सेंटर, सार्वजनिक संस्थानों तथा साप्ताहिक हाट-बाजार, मेला ग्राउंड, बस स्टैंड एवं खेल मैदान जैसी सार्वजनिक जगहों पर पेयजल एवं हाथ धोने की सुविधा हेतु आवश्यक व्यवस्था को भी योजना में शामिल किए जाने के संबंध में जानकारी दी गई।
GPDP में प्राथमिकता के आधार पर होगा योजनाओं का समावेशन
कार्यशाला में संबंधित पंचायत प्रतिनिधियों एवं कर्मियों को निर्देशित किया गया कि ग्राम पंचायत विकास योजना तैयार करते समय 16वें वित्त आयोग की आबद्ध निधि से संबंधित Planning Format के अनुरूप ही पेयजल एवं स्वच्छता योजनाओं/गतिविधियों का चयन किया जाए। चयनित योजनाओं का प्राथमिकता निर्धारण, आवश्यक अनुमोदन तथा e-Gramswaraj में ससमय प्रविष्टि सुनिश्चित करने पर विशेष बल दिया गया।
साथ ही यह सुनिश्चित करने को कहा गया कि आबद्ध निधि का उपयोग निर्धारित दिशा-निर्देशों एवं वित्तीय नियमों के अनुरूप हो तथा योजनाओं के चयन में स्थानीय आवश्यकता, पेयजल व्यवस्था की निरंतरता, जल स्रोतों की स्थिरता, जल गुणवत्ता एवं सेवा वितरण में सुधार को प्राथमिकता दी जाए।
कार्यशाला के माध्यम से पंचायत स्तर के जनप्रतिनिधियों एवं संबंधित कर्मियों को आबद्ध निधि के प्रभावी एवं नियमानुकूल उपयोग को लेकर आवश्यक तकनीकी एवं प्रक्रियात्मक जानकारी प्रदान की गई, ताकि ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल एवं स्वच्छता सेवाओं को अधिक प्रभावी, सतत एवं जनोपयोगी बनाया जा सके।




