जन्मदिन विशेष झारखंड आंदोलन की माटी से उपजे विधायक नागेंद्र महतो ने हार को कभी हार नहीं माना
Last Updated on January 31, 2026 by Gopi Krishna Verma

बिरनी। झारखंड आंदोलन की माटी से उपजे आंदोलनकारी बगोदर विधायक सह सचेतक नागेंद्र महतो का आज 75वां जन्मदिन है, उनका जन्म 31 जनवरी 1951 को गिरिडीह जिले के बगोदर प्रखंड अंतर्गत खेतको गांव में हुआ था। उनके पिता स्वर्गीय लाखो महतो एक किसान थे, जो कठिन परिश्रम के बावजूद साधारण जीवन जीते थे। माता स्वर्गीय चुनरी देवी का स्वभाव अत्यंत सादगीपूर्ण और त्यागमयी रहा। माता–पिता ने भले ही बेटों को संपत्ति या ऐश्वर्य न दिया हो, लेकिन ईमानदारी, मेहनत और संघर्ष के संस्कार कूट कूट कर भरे, यही संस्कार आगे चलकर नागेंद्र महतो के जीवन की नींव बना।

गांव के सामान्य परिवेश में पले बढ़े नागेंद्र महतो, उनकी पारिवारिक जीवन शैली आज भी ग्रामीण परिवेश की सादगी को दर्शाती है। वे बड़े परिवार की जिम्मेदारियों को निभाते हुए भी हमेशा समाज और जनता को प्राथमिकता देते रहे हैं। उनके व्यक्तित्व में मां की करुणा और पिता की सादगी का मिला जुला रूप स्पष्ट दिखाई देता है।नागेंद्र महतो का जीवन साधारण किसान परिवार से शुरू होकर राजनीति के शिखर तक पहुँचने की कुछ अलग हीं कहानी है, जो संघर्ष, सपनों और उम्मीदों से बुनी गई है।
बगोदर प्रखंड का खेतको गाँव,जहाँ चारों ओर खेत, कच्ची गलियाँ और मेहनतकश जीवन की झलक मिलती है, वहीं इस जुझारू नेता ने आँखें खोली। खेतों में काम करने वाले हाथों से पैदा हुआ इस ग्राम का बेटा राजनीति के गलियारों में जनसेवा की मिसाल बनेगा, शायद ही किसी ने सोचा हो। लेकिन नागेंद्र महतो ने यह साबित कर दिखाया कि बड़े काम करने के लिए बड़े घराने की जरूरत नहीं होती। मेहनत, ईमानदारी और जनसेवा का जज्बा ही असली पूँजी है। राजनीति में उनका सफर सीधे चुनावी मैदान से शुरू नहीं हुआ। यह एक लंबी प्रक्रिया थी, जिसमें छात्र जीवन की हलचल, समाजसेवा की अलख, आंदोलन की आँधियाँ और असफलताओं की कड़वी अनुभव शामिल थी।

पहले शिक्षक बने, फिर समाजसेवी और अंततः झारखंड आंदोलन के सिपाही के रूप में उभरने वाला नागेंद्र महतो की छवि जमीन से जुड़ी और संघर्षशीलता ने उन्हें धीरे-धीरे जनता के दिलों में जगह दिला दिया। नौकरी की स्थिरता छोड़कर जनता का रास्ता चुनना किसी साहसिक कदम से कम नहीं था। यही साहस उन्हें गाँव-गाँव, खेत-खेत और गली-गली में ‘अपना आदमी’ बनाता चला गया।शिक्षा और शिक्षक बनने का सफर।
नागेंद्र महतो की शिक्षा यात्रा आसान नहीं रही। गाँव से निकलकर पढ़ाई करना उस दौर में विशेष चुनौती थी। उन्होंने 1971 में हजारीबाग के विष्णुगढ़ हाई स्कूल से मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की। इसके बाद उन्होंने बेसिक टीचर्स ट्रेनिंग (बीटी) की पढ़ाई की और एक शिक्षक के रूप में अपनी सेवाएँ देने लगे। उनका पहला नियुक्ति स्थान गोमिया प्रखंड के कुंडा स्थित प्राथमिक विद्यालय था।शिक्षक बनने के बाद भी उन्होंने पढ़ाई जारी रखी। बेरमो के केबी कॉलेज से प्राइवेट इंटर (आर्ट्स) किया और फिर हजारीबाग से 1982 में स्नातक की डिग्री प्राप्त की। इसके बाद वे बोकारो जिला के कथारा मध्य विद्यालय में अध्यापक बने। उनकी पहचान केवल पढ़ाने वाले शिक्षक तक सीमित नहीं रही, बल्कि वे बच्चों और अभिभावकों के बीच एक मार्गदर्शक, प्रेरक और सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में भी लोकप्रिय हो गए।

साधारण किसान परिवार के बेटे नागेंद्र महतो ने जब शिक्षक की नौकरी छोड़ झारखण्ड आन्दोलन व राजनीति की कठिन राह चुनी, तो उनके सामने केवल अनिश्चितता और संघर्ष था। नौकरी उन्हें सुरक्षा और स्थिरता दे सकती थी, लेकिन उन्होंने स्थिर जीवन के मोह को त्यागकर अशांत जीवन को अपनाया। उनका मानना था कि झारखंड की मिट्टी और यहाँ के लोग उन्हें पुकार रहे हैं। यही पुकार उन्हें आंदोलन की पगडंडी से होते हुए राजनीति की मुख्यधारा तक ले गई।राजनीति में कदम रखते ही उन्हें बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ा। 1995 से लेकर 2009 तक चार चुनाव लड़े और हर बार हार का सामना करना पड़ा। लेकिन उन्होंने हार को कभी अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया। हर हार उनके संकल्प को और मजबूत करती गई। वे जनता के बीच डटे रहे, लगातार संघर्ष करते रहे और अंततः वह दिन भी आया जब उन्होंने विधानसभा चुनाव जीतकर यह साबित कर दिया कि सच्चा संघर्ष कभी व्यर्थ नहीं जाता है। आंदोलन की प्रवृत्ति वाले नागेंद्र महतो ने हार को कभी अपनी पराजय नहीं माना।

वे मानते हैं कि जनता की सेवा और समाज के लिए किए गए कार्य एक दिन उन्हें जरूर पहचान दिलाएंगे। और यह विश्वास 2014 में सच साबित हुआ, जब उन्होंने भाजपा के टिकट पर बगोदर से जीत हासिल की। यह जीत केवल उनकी व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं थी, बल्कि यह उन सभी संघर्षशील लोगों के लिए संदेश था कि ईमानदार कोशिशें देर से ही सही, मंज़िल तक जरूर पहुंचती हैं। 2019 के विधानसभा चुनाव में उन्हें फिर मुंह की खानी पड़ी, भाकपा माले के कद्दावर नेता विनोद सिंह से मामूली अंतर से चुनाव हार गए। परंतु हार के बाद भी जनसेवा की उनकी भावना बनी रही नतीजा पांच वर्ष बाद पुनः 2024 के विधानसभा चुनाव में बड़ी अंतर से दुबारा बगोदर की जनता ने उन्हें सर आंखों पर बिठाया।
